Tuesday, October 8, 2019

प्रमुख लीला-स्थल और भक्त श्रीधर को दर्शन-

प्रमुख लीला-स्थल और भक्त श्रीधर को दर्शन-

शेरावाली माँ 

कहानी आज से सात सौ साल पहले की है। आजकल जहाँ कटरा बसा हुआ है उससे लगभग दो कि मीटर की दूरी पर बसा हुआ हंसाली नामक गाँव, जिसमें चार ओर वक्षों और लताओं से घिरा हुआ हरा-भरा रमणीक स्थल,नीचे कल-कल स्वर में बहती हुई जलधारा, मन्थर गति से बहता पवन। ऐसे सुखद वातावरण में त्रिकूट पर्वत की उपत्यकाओं से टकराकर मन्त्रों एवं स्तुति की मधुर ध्वनि गूंज रही थी-

"जय महादेवी, जय अम्बे, जय भवानी जय..." एकाएक गला रुंध गया, आँख भर आयीं, उन्नत ललाट पर चन्दन के तिलक के साथ पसीने की बँदें, उभर आयीं-"... मेरी पूजा चना में आखिर क्या त्रुटि है? हे भगवती! तम तो घट-घट का जानने वाली हो। मेरी विनती. मेरी प्रार्थनाएँ क्यों स्वीकार नहीं करती? हे जगद्माता। कृपा करो। मेरी भूल, और अवगुण क्षमा करो। नहीं तो... नहीं तो सामने आकर स्पष्ट कह दो कि मेरे भाग्य में सन्तान सुख नहीं है। परन्तु मेरा वंश कैसे चलगा कैसे..........?"

पं० श्रीधर जी भावातिरेक में जैसे अपने आप से ही बात करते जा रहे थे, बुदबुदाहट करते हुए होंठ फड़फड़ा रहे थे, शरीर कांपने लगा था--तभी पत्तों की खड़खड़ाहट के साथ-आहट सुनाई दी, फिर-


"छन-छन-छन.........."


पाजेब की ध्वनि सुनाई दे। पंडित जी ने सिर उठाकर ऊपर देखा तो पत्तों के बीच से छनकर आता सूर्य का प्रकाश उनके मुख पर पड़ा, एक अजीब सी चमक थी। श्रीधर जी कुछ समझ नहीं पाए। आस-पास दृष्टि दौड़ाई, कोई भी तो नहीं था। अपना भ्रम समझकर उन्होंने पुष्प अर्पण किए लोटा सम्भाला और ऊपर गाँव की ओर चल दिए, कन्या पूजन की तैयारी भी करनी थी।


कन्या-पूजन शुरू हुआ! छः छोटी-छोटी बालिकाएं पंक्तिबद्ध होकर पालथी मार कर बैठी हुई थीं। पं० श्रीधर जी एक-एक करके सबके चरण बहुत श्रद्धा एवं भक्ति से पानी से धोकर साफ कर रहे थे कि अकस्मात् फिर वही आवाज उनके कानों में गूंजी... छन...छन... छन...

श्रीधर जी ने पाँव धोते हुए दृष्टि ऊपर उठाई तो एक अनुहा सौन्दर्य एवं आभा से युक्त बालिका को सन्मुख खड़ें पाया। पंडित जी आश्चर्य में डूब गए। ऐसा अलौकिक तेज उस कन्या के मुखमंडल पर विराज रहा था जैसे सैकड़ों सूर्य एक साथ आकाश में उदय हो गए हों! ऐसा भोलापन! मानो हजारों कमल- पुष्प एकदम खिल गए हों!! यह कन्या तो पहले कभी उन्होंने देखी न थी, न ही उनके गाँव की प्रतीत हो रही थी। लाल- लाल कपड़े, पैरों में छन-छन करती पाजेब!!!

कन्या ने अपना पैर आगे बढ़ा दिया। श्रीधर जी विस्मय में डूबे हुए चरण धोने लगे। फिर सातों कन्याओं की चरण वंदना करके उन्होंने जलपान परोसा, और भोजन के बाद दक्षिणा दी। अन्य कन्यायें तो दक्षिणा लेकर चली गयीं, पर वह दिव्य रूप वाली कन्या वहीं बैठी रही। श्रीधर जी उससे कुछ प्रश्न करने वाले थे कि कन्या-रूपी महाशक्ति स्वयं ही बोली-

"मैं तुम्हारे पास एक आवश्यक कार्य लेकर आई हूं" छोटी सी कन्या के मुँह से ऐसी विचित्र बात सुनकर भक्त
जी और भी हैरान हो गए।

कन्या बोली-आप अपने गाँव में और आसपास यह संदेश दे आओ कि कल दोपहर को आपके यहाँ महान भंडारा होगा। इससे पहले कि पंडितजी कोई प्रश्न पूछे वह कन्या न जाने किधर लोप हो चुकी थी। श्रीधर जी विचारों में डूब गए। आखिर यह कन्या कौन थी?


हो न हो, यह अवश्य ही कोई दिव्य-बालिका थी, परन्त भंडारे वाली समस्या से श्रीधर जी परेशान हो गए। सोचने लगे कि निमन्त्रण तो में दे आऊंगा, परन्तु भंडारे का प्रबन्ध कौन करेगा? मुझमें तो इतनी सामर्थ्य नहीं कि भंडारा कर सकँ... फिर क्या करूँ? न जाऊँ? परन्तु... यदि कन्या कोई दिव्य शक्ति है तो अवश्य ही यह मेरी परीक्षा की घड़ी है। काफी सोच- विचार के बाद उन्होंने कन्या की कही बात को ही मुख्य रखा और निकल पड़े, आस-पास के कछ गांव और घरों में भंडारे का निमन्त्रण देने।

"देख लीजिए पंडित जी, एक बार फिर सोच-विचार कर बताइए। अभी भी समय है। ऐसा न हो कि ऐन मौके पर
आपको हमारे गुरु जी के कोप का सामना करना पड़े। हमारे गुरुजी चाहें तो क्षण भर में अपनी क्रोधाग्नि से आपके पूरे ग्राम को जलाकर भस्म कर दें।"भैरवनाथ ने पंडित श्रीधर जी को समझाने का प्रयत्न किया "पंडित जी, आप शायद नहीं जानते कि हमें एक बार देवराज इन्द्र ने भी भोजन का निमन्त्रण दिया था। वह भोजन लाते रहे। हम योगी-जन खाते रहे। बेचारे... इन्द्रदेव! पूरी इन्द्रपुरी में भोजन का अकाल पड़ गया। सभी भागे-भागे फिरते रहे और अन्त में हमें भर पेट खाना न खिलाकर क्षमा माँगने लगे... हा-हा-हा-हा हमें तो देवराज इन्द्र भी भर पेट भोजन न खिला सके। आप हमें भोजन का निमन्त्रण देकर हुत बड़ी भूल कर रहे हैं, पंडित जी!"

आप साधु-सन्त हैं, योगी हैं। भाग्य से आपके दर्शन हुए। हैं। भण्डारे का निमन्त्रण मैंने आस-पास सभी जगह दिया है। मैंने अपना कर्तव्य जानकर ही आपको कल अपने घर पधारने की प्रार्थना की है। यद्यपि मैं जानता हूँ कि मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं इतने बड़े भंडारे का आयोजन कर सकूँ। फिर भी...' श्रीधर जी हाथ जोड़कर कह रहे थे-


"फिर भी क्या?"


"योगीनाथ! उस कन्या का यही आदेश है, श्रीधर जी ने कुछ हिचकिचाहट के साथ निवेदन किया। "कन्या? कौन कन्या? यह भी खुब रही। एक अकेली कन्या पूरे योगियों के दल को खाना खिलाएगी। पूरे गाँव का भंडारा कर देगी? अरे वाह! देखिए तो गुरुजी, यह पंडित जी क्या कह रहे हैं? अकेली कन्या सबको खाना देगी! भैरवनाथ
ठहाका लगाकर हँसने लगे परन्तु उनके गुरु गोरखनाथ ने बीच में ही उन्हें रोककर कहा-


'भई परीक्षा करने में क्या नुकसान है। हमें कल इनके घर चलकर देख लेना चाहिए कि ऐसी कौन कन्या है?' हाथ उठाकर गुरुजी ने पंडित श्रीधर से कह दिया, 'हमें भोजन स्वीकार है, कल समय पर हम पहुँच जायेंगे।


उस दिन तो श्रीधर जी गाँव-गाँव घूमते थके-हारे रात को आकर सो गए। प्रातःकाल होते ही वे फिर इस विचार में खो गए कि भंडारे का प्रबन्ध कैसे हो सकेगा। न मालूम समय कैसे "बीत गया और भीड़ एकत्रित होने लगी।

दोपहर का समय! चमकीली धूप!

चमकीली धूप


श्रीधर जी अपनी कुटिया के बाहर मिट्टी के बने चबूतरे पर बैठे हुए थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्या करें? कैसे होगा? तभी उनके कानों में चिमटा बजाते हुए अलख ध्वनि सुनाई पड़ी... अलख निरंजन! जय भोलेनाथ!! ....... सामने देखा तो पूरे दल-बल के साथ जोगी भैरवनाथ और गुरु गोरखनाथ आ रहे थे।

कौतुहल बढ़ गया, गाँव के सभी लोग कुटिया के बाहर इकट्ठहोकर देखने लगे। तरह-तरह की बातें आपस में करने लगे। कोई कहता पंडित जी तो आज फंस गए हैं। दूसरा कहता-देखो तो सही अभी पूरे गाँव की नाक कटेगी, बिना सोचे समझे इतने गाँव वालों को भंडारा कह दिया, कोई हंसी खेल है क्या? स्त्रियाँ भी फुसफुसाने लगीं।

तभी धूप अचानक फीकी पड़ गई। कुछ बादल घिर आए फिर एक क्षण के लिए अंधेरा हआ और एकदम पहले से भी कहीं अधिक प्रकाश निखर आया, धूप कड़कने लगी और। आश्चर्य यह कि... दिव्य कन्या लाल-सुए वस्त्र धारण किए, कमण्डल हाथों में लिए, त्रिशल कांधे पर रखे, श्रीधर जी के सन्मुख खड़ी थी। किसी को पता ही नहीं लगा कि वह कन्या का कब और कहाँ से प्रकट हो गई?

'भक्तजी चिन्ता छोडो। अब सारा प्रबन्ध हो जायगा।

उठिए और सबसे पहले जोगियों से कहिए कि कुटिया में चल कर भोजन ग्रहण करें।' श्रीधर जी उत्साह से उठे और गुरुजी से भोजन के लिए कुटिया में पधारने को कहा।

गुरु गोरखनाथ जी बोले-हम अपने ३६० चेलों सहित आपकी छोटी सी कुटिया में कैसे बैठ सकेंगे? हमारे लिए तो
बाहर खुला स्थान ठीक रहेगा। कुटिया तो बहुत ही छोटी है। पंडित जी आप भोजन यहाँ ले आइये।


इस पर श्रीधर जी ने कहा-उस कन्या ने आपको कुटिया में एधारने के लिए ही कहा है। गुरुजी के पीछे एक-एक
करके सभी शिष्य कुटिया में जाते और बैठ जाते। ऐसा लगता कि अभी कुछ स्थान खाली है। धीरे-धीरे सभी शिष्य आराम से कुटिया में समा गए और चमत्कार यह हुआ कि कोने में | फिर भी थोड़ा स्थान खाली बच रहा!! बाहर सब गाँव वाले बैठ गए। भंडारा प्रारम्भ हुआ। दिव्य कन्या ने जब अपने कमण्डल से सबको भोजन देना प्रारम्भ किया तो श्रीधर जी प्रसन्न हुए और बाकी सब हैरान! सबको अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भोजन मिल रहा था। भाँति-भाँति के व्यंजन अपनी-अपनी इच्छानुसार लेकर सब रुचि-रुचि कर खाने लगे।


यह देखकर गोरखनाथ और भैरवनाथ ने परस्पर विचार किया कि यह कन्या अवश्य ही कोई शक्ति है। पर यह वास्तव में कौन है? इसका पता लगाना चाहिए। कन्या धीरे-धीरे भोजन | परासता हईभरवनाथ कपास पहुचा।

'बालिके! तूने सबको उनकी इच्छानुसार भोजन परोसा है, मझे भी मेरा मनपसन्द भोजन मिलना चाहिए।


'बोलो योगीनाथ, क्या चाहिए तुम्हें?'

माता सब कुछ जानते हुए भी-अन्तर्यामी होने पर भी- जैसे कोई लीला करना चाहती थी। जिस प्रकार कोई बालक अपने खिलौने से खेल करता है, उसके आगे-पीछे भागता है, बातें करता है, ठीक उसी प्रकार माता ने भी कोई खेल रचाना। चाहा होगा। इसलिए भैरव के मन की सारी बातें जानते हए भी कन्या-रूपी माता ने प्रत्यक्ष में भैरव के मुख से ही सनना चाहा-

'तो ला फिर कन्या! मुझे मांस-मदिरा का भोजन दे।''नाथ जी आपको यह नहीं भूलना चाहिये कि आप एक वैष्णव ब्राह्मण की कुटिया में विराजमान हैं और यह भंडारा केवल वैष्णव-भंडारा है। अब जो कुछ एक वैष्णव-भंडारे में
मिल सकता है, वही माँगिये।

भैरवनाथ अपने हठ पर ही रहा। वह कन्या की परीक्षा लेना चाहता था। तर्क-वितर्क करता रहा, जिद करता रहा और क्रोध करके भैरव ने जैसे ही कन्या का हाथ थामना चाहा वह कन्या-रूपी-महाशक्ति अन्तर्ध्यान हो गई। भैरों भी कोई साधारण योगी नहीं था। आँखें मूंदकर, समाधि लगाकर बैठ गया और थोड़ी देर में ही योग-विद्या के बल प्रभाव से उसने जान लिया कि कन्या पवन-रूप होकर त्रिकूट-पर्वत की ओर बढ़ रही है। उसकी जिज्ञासा और भी बढ़ गई आखिर यह कन्या है कौन? कौन-सी शक्ति है? इसी जिज्ञासा के वशीभूत होकर वह अपने गुरु गोरखनाथ से आज्ञा मांगने लगा-

 'गुरु जी, मैं कन्या का पीछा करता हूँ और पता लगा कर आऊँगा कि यह कौन है? कहाँ इसका निवास स्थान है?

यदि इसे कोई सिद्धि प्राप्त है तो कहाँ से हुई, कैसे हुई? इन सब बातों की जानकारी हमें अवश्य प्राप्त करनी चाहिये। इस कार्य पर जाने के लिए क्या आप आज्ञा देंगे?"

'जैसी तुम्हारी इच्छा वत्स, ईश्वर कल्याण करेंगे?'

भैरवनाथ अकेले ही त्रिकूट-पर्वत की ओर बढ़ चला। उसे तो कन्या को पकड़ लेने की धुन सवार हो गई थी। वह
समाधिस्थ होकर कुछ देर तक पवन रूपी कन्या का मार्ग देखता और उसी ओर पीछे-पीछे चल पड़ता।

पं० श्रीधर जी की कुटिया से दिव्यकन्या को लोप हुए आज दूसरा दिन था।

पंडित जी अत्यन्त बेचैन हो उठे। उनकी दशा ठीक उसी प्रकार हो गई थी जैसे किसी मछली को तालाब से निकालकर बाहर फेंक दिया गया हो-जल के बिना मछली जिए तो कैसे? वह निरीह भाव से लगातार शून्य की ओर देखे जा रहे थे। न खाना, न पीना, न किसी से कोई बात-चीत। उनेको ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी प्यासे के हाथ से सागर छिन।गया हो। दिन ढल गया, रात्रि आ गई। भूखे-प्यासे ही सो गये।

सोते हुए पंडित श्रीधर को ऐसा लगा कि उनके सिर पर।कोई हाथ फेर रहा हो। कोमल स्पर्श पाते ही श्रीधर जी ने दृष्टि घुमाकर देखा कि साक्षात् देवी दुर्गा सिंह पर विराजमान होकर विशल, आभूषण एवं समस्त आयुधों से सुसज्जित उनके सामने बैठी है। पंडित जी ने साष्टांग प्रणाम किया, नतमस्तक होकर स्तुति की, दीप जलाया। माता ने उनसे कहा कि आपने अन्न- जल क्यों त्याग दिया? भूखे रहकर भी कभी भजन होता है? चलिए, आज मैं आपको अपने धाम के दर्शन करवा देती है।

श्रीधर जी माता के पीछे हाथ जोड़ कर चलने लगे। ऐसा जान पड़ता था कि सब कुछ यन्त्रवत् हो रहा है उन्होंने पर्वत पर चढ़ना आरम्भ किया। किसी अदृश्य गुफा तक जा पहुंचे।

गुफा का प्रवेश द्वार काफी छोटा होने के कारण वह लेटकर अन्दर गये। गुफा के अन्दर माता ने उन्हें अपना स्थान दिखाया। दर्शन करके भक्त जी गद्गद् हो उठे। बारम्बार शीश झुकाकर विनती की और स्वयं को कृतार्थ किया। फिर गुफा के बाहर निकले और जैसे ही बाहर की तेज रोशनी उनकी आँखों पर पड़ी उनकी निद्रा खुल गई। प्रातः हो चुकी थी। सूर्यदेव की लालिमा आसमान पर उभरने लगी थी। श्रीधर जी आँखें मलते हुए, जय माता की कहते हुए उठ बैठे।

पंडित श्रीधर जी उठे तो बहुत प्रसन्न थे। स्वप्न में देखे हुए स्थानों से उनका हृदय अब तक पुलकित था। माता का सिंह वाहनी-स्वरूप अब तक उनके मानस पटल पर अंकित था। पर्वतीय मार्ग के स्थान, सुन्दर गुफा का प्रवेश द्वार और गुफा के अंदर भगवती के पिंडी रूप में दर्शन उन्हें किसी फिल्म के दृश्यों की भाँति पूरी तरह याद थे।

पूरे नौ महीने बीत चुके थे।

भैरवनाथ पर्वत पर इधर-उधर भटक रहा था। कई बार उसने अपनी समस्त चित्तवत्तियों को एकाग्र करके समाधि लगाई थी। योग-विद्या की जितनी भी जानकारी थी, सारी प्रयोग करके भी वह निश्चित न कर पाया कि कन्या कहाँ गई है। उसे लगता था कि है तो वह कन्या इसी पर्वत के किसी भाग में, परन्तु कहाँ है? उसके जाने का मार्ग स्पष्ट नहीं था। पहली बार उसने देखा था कि उसके साथ बन्दर (लांगुर वीर) झण्डा लेकर चल रहा है। फिर कन्या ने तीर चलाकर पत्थरों से पानी निकाला। उस स्थान पर पहुँचने के बाद भैरव ने फिर समाधिस्थ होकर देखा कि वह कन्या ऊपर जाकर खड़ी है। भैरव ने वहाँ जाकर देखा पैरों के चिन्ह साफ-साफ पत्थर पर
दिखाई दे रहे थे। और ऊपर का मार्ग भी उसने अन्दाज़ लगा लिया था। फिर अचानक ही उसे ऐसा लगा कि कन्या कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रही। वह सारे पर्वत पर नौ माह तक खोजता रहा, परन्तु जिज्ञासा इतनी प्रबल थी कि उसने फिर भी खोजने का काम जारी रखा।

'क्या आपने किसी कन्या को यहाँ आते-जाते देखा है?' एक वृद्ध तपीश्वर साधु को देखकर भैरों ने पूछा।

'नाथ जी शायद आपको मालूम नहीं कि इस पर्वत पर स्वयं महादेवी निवास करती हैं। उनके अतिरिक्त यहाँ और कौन हो सकता है?'

'परन्तु मैं तो उस कन्या को ढूंढ़ रहा है जो पूरे नौ महीने से इसी पर्वत पर कहीं छिपी हुई है, जिसको मैंने स्वयं इधर आते हए देखा था-वह कन्या कहीं इस गुफा में तो नहीं?' ऐसा कहते हुए भैरोनाथ सामने एक छोटी गुफा देखकर उसमें घसने का उपक्रम करने लगा।


तपीश्वर ने भैरों का मार्ग रोक लिया गुफा के द्वार के सामने खड़े हो गये और बोले-अरे मूर्ख! जिसे तू साधारण
कन्या समझता है, वह तो महाशक्ति है और आदिकुमारी' है। अब तेरी भलाई इसी में है कि तू वापिस चला जा।


शास्त्रों में लिखा है-'विनाश काले विपरीत बुद्धि।'


अर्थात जब एक मनुष्य का अन्त समीप आ जाए तो उसकी अक्ल भी मारी जाती है। बिल्कुल ऐसा ही भैरव नाथ के साथ भी हो रहा था। ज्यों-ज्यों तपीश्वर उसे समझाने का प्रयत्न कर रहे थे त्यों-त्यों उसकी बुद्धि में हठ प्रवेश करता जा रहा था। जैसे किसी की बद्धि अथवा ज्ञान हर लिया जाए तो उसकी विचार शक्ति कुण्ठित हो जाती है, वैसे ही भैरोनाथ की सोचनेया विचारने की शक्ति क्षीण हो गई थी। वह निरन्तर हठ कर रहा था।

'यह कोई गुफा है या गर्भयोनि जहाँ यह कन्या नौ महीने से अन्दर छिपी बैठी है, मैं तो उसे ढूँढ़ कर ही दम लूँगा' ऐसा कहते हुए भैरों जबरन गुफा के अन्दर घुसने लगा।


गुफा के अन्दर बैठी जगत्माता यह सब देख रही थीं। उन्हीं की आज्ञा से तो यह सारी लीला हो रही थी वह चाहतीं तो वहीं भैरव का काम तमाम कर सकती थीं परंतु...


जगत् की स्वामिनी यदि कोई खेल रचाना चाहें तो उन्हें कौन रोक सकता है? संसार के प्राणी तो उसके हाथों में खिलौनों की तरह हैं। वह जैसे चाहे खेल करे, चाहे तो उसी क्षण तोड़


कुछ इसी प्रकार से माता, भैरोनाथ के साथ कौतुक कर रही थीं उन्होंने अपनी शक्ति से त्रिशूल द्वारा गुफा में पीछे से दूसरा मार्ग बनाया और बाहर निकल गईं।


महाशक्ति आगे बढ़ीं भैरव पीछा करता रहा।


अन्ततः देवी त्रिकूट पर्वत की सुन्दर-गुफा तक जा पहुँची।।देवी ने भैरों को आदेश दिया 'जोगी तुम वापिस चले जाओ।।


किन्तु भैरव न माना  देवी ने गुफा के द्वार पर वीर लांगुर को प्रहरी बना कर खड़ा कर दिया ताकि भैरों अन्दर न आ सके। स्वयं दिव्यकन्या गुफा में प्रवेश कर गई। यह देखकर भैरों भी अन्दर घुसने की चेष्टा करने लगा। लांगुर वीर ने रोका-


'महामाई की आज्ञानुसार गुफा के अन्दर जाना मना है।'
'तम कौन होते हो मुझे रोकने वाले? मैं भैरवबली हूँ,

जहाँ मेरा जी चाहे जा सकता हूँ।' और यह कहते हुए भैरोनाथ ने गदा छीन ली। क्रोधित होकर लाँगुर वीर ने अपनी गदा वापिस लेकर भैरों पर पूरी शक्ति से प्रहार किया। भैरों वार बचा गया। फिर गदा लेकर काफी देर तक खींचातानी होती रही। गुफा के अन्दर विराजमान जगत्माता सारा खेल देख रही थीं। धीरे-धीरे वीर-लाँगुर परास्त होने लगा। भैरों ने उसे दूर धकेल दिया और गुफा में प्रवेश करना चाहा। यह देखकर शक्ति ने स्वयं चण्डी रूप धारण करके तलवार से भैरव का वध कर दिया।


सम्भवतः देवी माता को इतना ही खेल रचाना था। जब कोई बालक चाबी घुमाता रहे और खिलौना उसकी मनमानी हरकत न करे, उसका मन-पसन्द खेल न दिखाए, तो वह उसे तोड़ भी सकता है चूँकि वह तो खिलौनों का स्वामी है, मालिक है। इसी प्रकार प्राणियों की स्वामिनी महादेवी ने भी एक खिलोना तोड़ दिया। तलवार का वार इतना तेज हुआ कि भैरों का धड़ तो वहीं गफा के पास तथा सिर ऊपर पर्वत को चाटा पर जा गिरा, जिसे आजकल भैरोंघाटी कहा जाता है।

भैरोनाथ कोई साधारण प्राणी नहीं था। वह एक सिद्धपुरुष महाबली तथा योगी था। सिर धड़ से जुदा हो गया। फिर उसकी चेतना नष्ट नहीं हुई। वह अपने किए पर पशेमान है। गया। पश्चाताप करने लगा-


'आदिशक्ति! कल्याणकारिणी माता! मुझे मरने का कोई दुःख नहीं क्योंकि मेरी मृत्यु जगत रचयिता माँ के हाथों से हुई है। सो मुझे मोक्ष मिलेगा। परन्तु हे मातेश्वरी, मुझे क्षमा का देना। मैं आपके इस रूप से अपरिचित था। हे माँ अगर तूने क्षमा न किया तो आने वाला युग मुझे पापी समझेगा और लोग मेरे नाम से घृणा करेंगे। माता न हो कुमाता....।


भैरों के मुख से वारंबार 'माँ' शब्द सुनकर माता का हृदय पसीज गया। जगकल्याणी मातेश्वरी ने उसे वरदान दिया- 'कि मेरी पूजा के बाद तेरी भी पूजा हुआ करेगी, तथा तू मोक्ष का अधिकारी होगा। श्रद्धालु मेरे दर्शन के पश्चात् तेरे भी दर्शन किया करेंगे। तेरे स्थान का दर्शन करने वालों की मनोकामनाएँ भी पूर्ण होंगी।


इसी वरदान के अनुसार यात्री माता वैष्णो के दरबार होकर, माता के दर्शन करने के बाद भैरों बाबा के दर्शनों के लिए भैरों मंदिर जाते हैं। जिस स्थान पर भैरों का सिर गिरा था उसी जगह भैरों मंदिर का निर्माण हुआ है।


जिस दिन से भक्त श्रीधर ने स्वप्न में माता के साथ उनके धाम में गुफा के दर्शन किए थे उसी दिन से उन्होंने वैष्णो देवी के साक्षात दरबार का खाज का काम शुरू कर दिया। स्वप्र में देखे मार्ग के अनुसार वह त्रिकूट-पर्वत पर चढ़ते गये। कर्ड बार उन्हें ऐसा लगता कि वह भूल गए हैं, फिर स्वयं ही स्वप्न के दृश्य याद आ जाते और रास्ता दिखाई दे जाता। इस प्रकार खोजते-खोजते उन्होंने एक दिन गुफा का द्वार देख लिया और फिर गुफा में प्रवेश करके, माता के पिण्डी रूप में दर्शन करके ने जीवन सफल बना लिया। श्रीधर जी ने बारम्बार हाथ जोड़कर 7 जगदम्बे की आराधना की। कई प्रकार से स्तुति एवं प्रार्थना करते रहे। वे नित्यप्रति पवित्र पिण्डियों का स्नान, पूजन एवं व आरती आदि करके भाँति-भाँति से सेवा करते। उनकी श्रद्धा एवं भक्तिदेखकर माता ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और चार - पुत्रों का वरदान दिया। माता ने आशीर्वाद देकर कहा कि। तुम्हारा वंश युगों युगों तक मेरी पूजा करता रहेगा और सुख- शांति, धन-धान्य वैभव सभी कुछ प्राप्त होगा। अब तक पंडित श्रीधर जी के वंशज माँ की पूजा करते आ रहे हैं।

इसके बाद श्रीधर जी ने गुफा का प्रचार किया। भक्तों की मनोकामनायें पूर्ण होती रहीं। प्रचार बढ़ता रहा। हजारों लाखों यात्री प्रतिवर्ष वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आने लगे और तीर्थ वैष्णो देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।


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