Tuesday, October 15, 2019

देवी के नवरात्रों की व्रत कथा-

वैष्णो माँ 

(राजा चन्द्रदेव पर कृपा)

प्राचीन काल में जम्मू के राजा चन्द्रदेव बड़े धर्मात्मा तथा दानी थे, उनकी राजधानी जम्मू नगर थी। उन्होंने कई मन्दिरों का निर्माण करवाया तथा स्थान-स्थान पर सदाव्रत लगवाए। एश्वर्य एवं दान आदि में किसी प्रकार की कमी न थी। परन्त दुर्भाग्यवश उनके कोई सन्तान न थी। रानी धर्मवती भी इसी कारण दुःखी रहा करती थी।

एक बार राजा चन्द्रदेव रानी सहित गङ्गा स्नान के लिए हरिद्वार गये। वहाँ उन्होंने महात्मा हंसदेव जी का प्रवचन सुना और प्रभावित हुए। उन्होंने महात्मा जी से प्रार्थना की कि वह रानी धर्मवती को संतान प्राप्त होने का आशीर्वाद प्रदान करें। महात्मा हंसदेव जी बोले-हे राजन्! आप संतान प्राप्ति के हेतु सर्वोत्तम चण्डी-पाठ सम्पन्न करावें। इसके अतिरिक्त आपके राज्य में त्रिकूट पर्वत की गुफा में भगवती वैष्णवी शक्ति का निवास है। वहाँ दर्शन एवं पूजन से मनोरथ पूरे होते हैं।

महात्मा हंसदेव जी का वचन हृदय में रखकर राजा चंद्रदेव राजधानी लौटे। फिर उन्होंने विधिपूर्वक चण्डी पाठ एवं यज्ञ कराया। फलस्वरूप भगवती की कृपा से परम रूपवती कन्या प्राप्त हुई, जिसका नाम चन्द्रभागा रखा गया। कछ समय बीतने पर अत्यन्त तेजस्वी सुन्दर पुत्र ने भी रानी की कोख से जन्म लिया। राजा-रानी धन्य हो गये।

राजकमारी के युवा हो जाने पर उसका विवाह महेशपुर के राजकुमार शांताकार के साथ किया गया। विवाह में
यथाशक्ति दहेज आदि देकर कन्या को विदा किया। इसके कछ वर्ष उपरांत, राजकुमार चन्द्रशील के विवाह पर, राजा ने महात्मा हंसदेव जी को जम्मू पधारने तथा युवराज को आशीर्वाद देने का बहुत आग्रह किया। राजा की प्रार्थना स्वीकार करके सदगुरु हंसदेव जम्मू पधारे। विवाह में भाग लेने के लिए राजकुमारी चंद्रभागा तथा उसका पति शांताकार भी आए हुए थे। महात्मा हंसदेव जी की दृष्टि जब राजकुमारी के मस्तक पर पड़ी तो उन्होंने योगबल से उसका भविष्य जान लिया। राजा चंद्रदेव को एकांत में उन्होंने बता दिया कि लड़की आज से सातवें दिन विधवा हो जायेगी।

महात्मा जी के वचनों को सुनकर राजा एवं रानी दोनों ने उनके चरण पकड़ लिए और सुरक्षा का उपाय पूछा। हंसदेव जी बोले-हे राजन् जब हरिद्वार में आप से पहली भेंट हुई थी, उस समय मैंने आपको त्रिकूट पर्वत वासिनी वैष्णव देवी के विषय में बताया था। वह देवी सब संकटों से छुटकारा दिलाने वाली है। यदि आपकी पुत्री उसकी आराधना करे तो कष्ट निवारण होगा। यह सुनकर राजकुमारी चन्द्रभागा ने देवी की आराधना प्रारम्भ की।

हंसदेव जी के वचनानुसार सातवें दिन राजकुमार शांताकार की दुर्घटना होने से मृत्यु हो गई। शोक समाचार चारों ओर फैल गया। राजकुमारी चन्द्रभागा मूर्छित होकर गिर गई। मूर्छा दूर होने पर अत्यन्त विलाप करते हुए प्रतिज्ञा की-माता वैष्णव देवी जब तक मेरे पति को पुनः जीवित न कर दें, मैं अन्न जल ग्रहण न करूँगी। भूखी-प्यासी रह कर अपने प्राण त्याग दूंगी। नौ दिन तथा नौ रात्रियों तक चन्द्रभागा निरन्तर वैष्णव माता की आराधना में, निराहार रहकर लगी रही। तपस्या से प्रसन्न होकर दसवें दिन भगवती वैष्णव देवी ने प्रकट होकर दर्शन दिए। शांताकार के मृत शरीर पर अमृत छिड़ककर उसे जीवित कर दिया। चन्द्रभागा ने बारम्बार स्तुति करके प्रार्थना की-हे माता!आपकी कृपा से मुझे सौभाग्य की प्राप्ति हुई है। अब तो केवल यही अभिलाषा है कि आप हमारे राज्य में निवास करें तथा अपनी कृपा सदैव बनाए रखें।

इसी कारण से आज भी भारतीय नारियाँ घर में खेती बीजती हैं और नौ दिन व्रत रखकर अपने सुहाग की मंगल
कामना करती हैं। इन्हीं दिनों को नवरात्रे कहते हैं। इनमें तीर्थ यात्रा एवं देवी के दर्शनों का विशेष फल माना जाता है।


(बाबा जित्तो व झिड़ी स्थान की कथा)


प्राचीन काल में जम्मू के समीप धार नामक गाँव में जित्तो नाम का व्यक्ति माता वैष्णो देवी का परम उपासक था। भगत जित्तो को ही बाबा जित्तो के नाम से भी पुकारा जाता है। भगत जित्तो के खेत गाँव से १० मील की दूरी पर थे। इसलिए वह सुबह ही चला जाता और दिन भर के काम के बाद शाम को ही  लौटकर भोजन किया करता था। जिस गांव में वह रहता था उसमें पानी का अभाव था। जित्तो सभी से प्रेम का व्यवहार करता और किसी को कष्ट नहीं देता था। गाँव वाले भी उसकी प्रशंसा करते थे। परन्तु उसके कोई सन्तान न थी।

जित्तो की दृढ़ भक्ति को देखकर एक बार वैष्णों देवी ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और वर मांगने को कहा। जित्तो ने कहा कि मैं आपके प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूं, माता ने इसे स्वीकार करते हुए और कुछ मांगने को कहा, तो भक्त जित्तो ने कहा-हे मातेश्वरी मेरे कोई सन्तान नहीं है और मेरे गाँव में पानी की कमी है अत: यह दोनों अभाव दूर कर दो। माता ने उत्तर दिया-हे भक्त! तुम अपने घर में एक भंगूड़ा (पालना) लाओ, उसमें मेरे स्वरूप जैसी कन्या उत्पन्न होगी, उसी समय तुम्हारे गाँव में पानी का झरना फूट पड़ेगा। उस झरने के जल में जो स्नान करेगा उसके सब रोग दूर होंगे। इतना कहकर माता अन्तर्ध्यान हो गई।

दूसरे ही दिन जित्तो पालना ले आया। वह माघ शीर्ष मास की चतुर्दशी का दिन था। उस पालने में दिव्य स्वरूप की कन्या प्रकट हुई ठीक उसी समय गाँव में झरने का जल निकला।पानी की कमी की पूर्ति देखकर ग्रामवासी सुखी हो गये। सब लोग मिलकर माता वैष्णों देवी और भक्त की जय-जयकार करने लगे।

धीरे-धीरे जब कन्या बारह वर्ष की हो गई तो वह अपने पिता को भोजन देने को 1-2 मील दूर के खेतों पर जाने लगी। एक बार जब जित्तो के खेत में चावल की फसल तैयार  हई तो कछ लटेरों ने आकर उसे मारा और फसल लूटकर ले गये। उस समय दुखी होकर जित्तो ने माता वैष्णो देवी को याद  किया तो माता सिंह की सवारी पर जित्तो को प्रत्यक्षता दर्शन  देकर बोली-हे भक्त! तुमने मुझे क्यों याद किया है?"

जित्तो को माता के प्रत्यक्ष दर्शन का वरदान पूरा हुआ और जित्तो उनके चरणों में गिरकर बोला-"माता लुटेरों ने आकर मेरी फसल लूट ली और मुझे मार-पीट कर छोड़ गये, इसी कारण दुखी होकर, आपको याद किया है।"

"मैं अभी उन लुटेरों को पकड़वा कर तुम जो चाहोगे दण्ड दूंगी।" माता का स्वर था।

लेकिन भगत जी ने कहा-उन लुटेरों के कारण ही आज मुझे आपके साक्षात दर्शन का सौभाग्य मिला है। मैं अब उन्हें किसी प्रकार का दंड नहीं दिलवाना चाहता। आप केवल इतना ही करें कि जो लोग मेरे चावलों कोखायें उनकी सन्तानें सवयं  ही इस स्थान पर आकर अपने दोष स्वीकार कर लें। ऐसा करने से अन्य लोगों को दुष्कर्म से बचने की प्रेरणा मिलेगी। 

यह सुनकर माता ने कहा-जो तू चाहता है वैसा ही होगा अब से प्रत्येक वर्ष जिसने तेरे चावलों को खाया होगा वे यहाँ आकर अपने दोष प्रकट करेंगे, अन्य श्रद्धालु भी जो इस स्थान के दर्शन को आयेंगे, उनकी मनोकामनायें पूरी होंगी।

 माता तो लोप हो गई और जित्तो ने दर्शन के बाद जीवान  व्यर्थ समझकर प्राण त्याग दिये उधर जब पत्री पिता का भोजन लेकर खेत पर गई तो पिता को मरा देखकर वियोग में उसने भी प्राण त्याग दिये। यह घटना जिस स्थान पर हुई उसे झिड़ी कहा जाता है। अब यह स्थान जम्मू से ९ कोस की दूरी पर अचामक गाँव में है।

यहाँ अब प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा को मेला लगता है। जिन लोगों ने भगत जित्तो के चावल लूटे थे उनकी सन्तानें इस स्थान पर आकर धरती पर सिर पटक-पटक कर अपना "दोष स्वीकार करती हैं और चावलों की खिचड़ी सब में बाँटते

भक्त जित्तो को 'बाबा जित्तो' और उनकी पुत्री को 'बुआ बाल कन्या' के नाम से याद किया जाता है।'


(महाराजा रणजीत देव की कथा)



लगभग तीन सौ पहले जब भारत में मुगलों का राज्य था।उस समय जम्मू में महाराज रणजीत देव राज्य करते थे। दिल्ली के बादशाह की प्रबल इच्छा थी कि किसी प्रकार जम्मू के शासक को अपने अधीन कर लें और इसके लिए लाहौर के प्रतिनिधि को कई बार आदेश दिया। परन्तु उस समय जम्मू जैसे पहाड़ी राज्य पर चढ़ाई करना आसान बात न थी। इसलिए प्रतिनिधि मीर मन्नू द्वारा रणजीत देव को धोखे से बुलाकर कैद कर लेने की योजना बनी। इधर महाराज भी उनके इरादे को समझ गये और उनके बार-बार बुलाने पर भी लौहार न गये।

कुछ समय पश्चात् एक बार महाराजा रणजीत देव शिकार के लिए गये। जब वे त्रिकूट पर्वत पर पहुँचे तो वहाँ चट्टान पर बैठी एक दिव्य कन्या के दर्शन किये। उस कन्या से उन्होंने  उसका नाम और अपने नगर का रास्ता पूछा तो देवी ने कहा-राजन् मेरा नाम वैष्णवी है और इस पर्वत की गुफा में मेरा  निवास है। यह कह उसने राजा को उसका रास्ता भी बता दिया।

इस पर राजा ने देवी से पुनः पूछा-हे देवी! लाहौर का  राज्यपाल मुझे छल से पकड़ने के लिए बार-बार बुलाता है मैं ।क्या करूँ? तब देवी ने कहा-तुम बिना संकोच उसके यहाँ चले जाओ वह तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। यह कहकर देवी एकदम लोप हो गयी।

कुछ दिन बाद जब राज्यपाल ने रणजीत देव को फिर लाहौर बुलाया तो महाराज देवी के आश्वासन पर चले गये महाराज के लाहौर पहुंचते ही मीर मन्नू ने उन्हें कैद कर लिया | तब रात्रि को देवी ने महाराज को स्वप्न में कहा कि तुम किसी , प्रकार की चिन्ता न करो कल तक राज्यपाल तुम्हें अपने आप ही छोड़ देगा। दूसरे दिन अचानक ही राजा को कैद से मुक्त कर दिया गया और राज्यपाल ने महाराज से सन्धि कर ली। इसके बाद राजा रणजीत देव ने 67 वर्ष तक राज्य किया।अपने शासन काल में महाराज ने वैष्णव देवी की गुफा तक के मार्ग को अच्छी तरह साफ करवाया जिससे यात्रियों को किस प्रकार का कष्ट न हो। वह स्वयं भी कई बार नंगे पैरों देवी के दर्शनों के लिए जाते रहे।



(श्री रामचन्द्रजी पर देवी की कृपा की कथा)

जिस समय रामचन्द्र जी अपनी सेना को साथ लेकर लंका पर चढ़ाई करने के लिए चले, समुद्र तट पर सेतु बांधते समय भगवान शंकर की आराधना की। उस समय भगवान शंकर ने प्रकट होकर उन्हें विजय का आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम भगवती दुर्गा की उपासना करो। उनकी कृपा से तुम्हें अवश्य श्री विजय प्राप्त होगी।


शिवजी के आदेशानुसार रामचन्द्र जी ने वहाँ पर भगवती दर्गा की आराधना की। उन्होंने देवी पर चढ़ाने के लिए 108 कमल पुष्प रखे। उस समय भगवती ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिये उन कमल के पुष्पों में से एक कमल के पुष्प को गायब कर दिया। पुष्प चढ़ाते समय जब रामचन्द्र जी ने देखा कि एक पुष्य की कमी है, उन्होंने कमल पुष्प के स्थान पर अपने कमल के समान एक नेत्र को ही निकाल कर भगवती की सेवा में समर्पित करने का पूरा निश्चय कर लिया।


इस निश्चय के अनुसार उन्होंने जैसे ही बाण की नोंक से अपने एक नेत्र को निकालना चाहा, वैसे ही भगवती ने साक्षात् प्रकट होकर उनके हाथ से धनुष-बाण को ले लिया तथा आशीर्वाद देते हुए कहा-'हे रामचन्द्र? मैंने स्वयं ही तुम्हारी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए कमल का एक पुष्प दृष्टि से ओझल कर दिया था। अब मैं तुम्हारी भावना को देखकर परम  प्रसन्न हैं। मैं तुम्हें वर देती हूँ कि रावण पर अवश्य ही विजय  प्राप्त करोगे'।

यह सुनकर रामचन्द्र जी ने कहा-'हे माता! आप मुझे  कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे मुझे रावण पर सरलता पूर्वक विजय प्राप्त हो सके।' तब भगवती ने उत्तर दिया-हे रामचन्द्र तुम इस स्थान पर एक यज्ञ करो और उस यज्ञ को कराने के लिए रावण को ही आमन्त्रित करो। यदि रावण उस यज्ञ में सम्मिलित नहीं हुआ तो वह अपने ब्राह्मण कर्म से भ्रष्ट होने के कारण स्वयं ही नष्ट हो जायेगा और यदि सम्मिलित हुआ तो  यज्ञ की समाप्ति पर वह तुम्हें आशीर्वाद अवश्य देगा। इस प्रकार उसका दिया आशीर्वाद उसी के लिये घातक सिद्ध होगा। इतना कहकर भगवती अन्तर्ध्यान हो गई।


तब रामचन्द्र जी ने उसी स्थान पर यज्ञ की रचना कर अपने एक दूत के द्वारा रावण के पास यह संदेश भेजा कि तुम मेरा यज्ञ कराने के लिये आओ। महापंडित रावण ने निमन्त्रण स्वीकार किया और यज्ञ कराने के लिए आया। यज्ञ की समप्ति पर रावण ने स्वयं ही रामचन्द्र को आशीर्वाद भी दिया कि तुमने जिस उद्देश्य से यह यज्ञ किया है, उसमें सफलता प्राप्त करोगे। इस आशीर्वाद के फलस्वरूप रामचन्द्र जी को रावण पर विजय पाना सरल हो गया और युद्ध-क्षेत्र में श्री रामचन जी के हाथों रावण की मृत्यु हुई।

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