Saturday, October 12, 2019

यात्रा के मुरव्य-स्थान और उनका इतिहास


दर्शनी दरवाजा-

कटरा से लगभग एक कि. मी. चलने के बाद दर्शनी दरवाजा बना हुआ है. जहाँ से त्रिकूट पर्वत का सुन्दर दृष्य 
दिखाई देता है। इसी मार्ग से होकर देवी कन्या त्रिकूट पर्वत  की ओर गई थी, स्मति स्वरूप यह स्थान बना है। भूमिका मन्दिर से भी एक मार्ग दर्शनी दरवाजा तक बना है।

बाण गंगा-

कन्या रूपी महाशक्ति जब वहाँ से लुप्त होकर आगे बढ़ी तो उसके साथ वीर लांगूर भी था। चलते-चलते वीर ।लांगूर को प्यास लगी तो देवी ने पत्थरों में बाण मारकर गंगा निकाली और उसकी प्यास को तृप्त किया। स्वयं महाशक्ति ने भी उसी गंगा में अपने केश धोकर संवारे, तभी से इस नदी को बाण गंगा कहा जाता है। कहीं-कहीं बाल गंगा भी लिखा गया है। 
बाण गंगा

यह स्थान कटरा से लगभग दो किलोमीटर दूर समुद्र तल से लगभग 2400 फीट की ऊँचाई पर त्रिकूट पर्वत की ओर है। जो लोग देवी के दर्शन करने आते हैं, बाण गंगा में स्नान करते हैं। इस क्षेत्र में यह भागीरथी गंगा की तरह ही पवित्र मानी जाती है। एक पुल पार करके सुन्दर मंदिर भी है। हलवाई और जलपान आदि की छोटी छोटी दुकानें हैं। त्रिकूट पर्वत  के चरणों में स्थित यह स्थान बहुत रमणीक है। बाण गंगा से चरण पादुका की चढ़ाई के लिए पक्की पौड़ियाँ सीढियाँ ) हैं। साथ ही दूसरी ओर एक पहाड़ी पगडण्डी अर्थात कच्चा पैदल मार्ग है, इस मार्ग से खच्चर घोड़े भी जाते हैं। यह रास्ता घुमावदार व लम्बा है। सीढ़ियों वाला मार्ग छोटा व सीधा चढ़ाई  का है। मार्ग में कई छोटे-छोटे मन्दिर व साधु  महात्माओं के डेरे हैं। काली माता का मन्दिर विशेष दर्शनीय है।

चरण पादुका-

इस स्थान पर रुक कर महाशक्ति देवी ने पीछे की ओर देखा था कि भैरव जोगी आ रहा है या नहीं। रुकने से इस स्थान पर माता के चरण चिन्ह बन गये, इसी कारण इस स्थान को चरण पादुका पुकारा जाता है।


बाण गंगा से यह स्थान 1.5 किलोमीटर की दूरी पर,समुद्र तल से 3340 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। एक मंदिर,- चाय, फल आदि की दुकानें हैं। वैष्णो देवी यात्रा में यह दूसरा पड़ाव है।

 आदि-कुमारी और गर्भजून गुफा-

चरणपादुका से काफी दूर चलकर वैष्णवी कन्या ने सामने एक गुफा के पास तपस्वी साधु को देखकर उसे अपनी दिव्य झलक दिखलाई और कहा-हे तपस्वी! मैं यहाँ कुछ समय । आराम करूँगी, कोई मेरे विषय में पूछे तो कुछ न बताना। यह  कहकर शक्ति गुफा में चली गई और जिस प्रकार बालक माता  के गर्भ में नौ महीने तक रहता है उसी प्रकार कन्या गुफा में नौ महीने तक तपस्या में लीन रही। उधर भैरव कन्या की खोज करता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा। उसने तपस्वी से पूछा-क्या तुमने किसी कन्या को इधर से जाते देखा है? यह सुनकर तपी ने भैरव से कहा-जिसे तू साधारण कन्या समझता है वह तो महाशक्ति है और आदिकुमारी है (अर्थात् जब से सृष्टि की रचना हुई तभी से उसने कौमार्य-व्रत धारण किया)। जा यहाँ से चला जा! भैरव सुनकर क्रोधित हुआ। और बोला कि मैं तो ढूँढकर ही दम लूँगा। भैरव ने गुफा में प्रवेश किया, गुफा में बैठी जगत्माता यह सब देख रही थी। माता ने अपनी शक्ति से त्रिशूल द्वारा गुफा के पीछे से दूसरा मार्ग बनाया और बाहर निकल गई। इसलिये इस गुफा को गर्भ जून गुफा और स्थान को आदिकुमारी कहा जाता है। शक्ति आगे बढ़ी, भैरव पीछा करता रहा।

चरण पादुका से यह स्थान 6.5 किलोमीटर तथा समुद्रतल से ऊँचाई 4780 फीट है। यहाँ एक पक्का तालाब है। भगवती वैष्णो का आदिकुमारी रूप में मन्दिर है। प्राकृतिक सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है। ठहरने के लिये बड़ी धर्मशाला है।बिस्तर, दरी व कम्बल आदि निःशुल्क धर्मार्थ ट्रस्ट की ओर से दिये जाते हैं। जो यात्री शेष यात्रा दूसरे दिन करना चाहें. वर रात भर यहाँ विश्राम कर सकते हैं। जलपान के लिये 3-4 दुकाने हैं।

हाथी मत्था

आदिकुमारी से आगे क्रमश: पहाड़ी यात्रा सीधी खड़ी चढाई के रूप में प्रारम्भ हो जाती है। इसी कारण इसे हाथी मत्था के समान् माना गया है। सीढ़ियों वाले रास्ते की अपेक्षा घुमावदार पहाड़ी पगडंडी से जाने में चढ़ाई कम मालूम देती है। समुद्र तल से ऊँचाई ६५०० फीट के लगभग है।

सांझी छत

आदिकुमारी से यह स्थान साढ़े चार किलोमीटर तथा -समुद्रतल से लगभग 6200 फीट है। यहां से भैरव मंदिर तक छोटा रास्ता गया है। चाय की दुकान व ठण्डे जल की प्याऊ है

सामान्यतया दरबार जाने वाले यात्री हाथी मत्था से आगे सांझी छत की ओर न जाकर, नये रास्ते से दिल्ली वाली छबील की ओर चले जाते हैं, चूँकि भैरव मंदिर के अन्दर दर्शन करने का विधान लौटती बार है। इस प्रकार दिल्ली वाली छबील से "होकर जाने में छोटा रास्ता व कम चढ़ाई पड़ती है। लगभग दो कि.मी. दूरी कम हो जाती है। वापसी में भैरव मंदिर के दर्शन किये जा सकते हैं।

भैरव मन्दिर का इतिहास

देवी कन्या आगे बढ़ती रही-भैरव पीछा करता रहा। देवी ने भैरव को आदेश दिया-जोगी तुम वापिस चले जाओ।
किन्ते भैरव न माना। चाहती तो महामाया सब कुछ कर सकती थी, परन्तु भैरव की जिज्ञासा भी सच्ची थी। अंत में देवी त्रिकूट पर्वत की सुन्दर गुफा तक पहँची। गुफा के द्वार पर उसने वीर लांगूर को प्रहरी बनाकर खड़ा कर दिया और भैरव को अंदर  आने से रोकने के लिये कहा। कन्या गफा में प्रवेश कर गई तो भैरव भी घुसने लगा। वीर लांगर के साथ भैरव का युद्ध हुआ। वीर लांगूर परास्त होने लगा। फिर स्वयं शक्ति ने चंडी रूप धारण कर भैरव का वध कर दिया। धड़ वहीं गुफा के पास तथा सिर भैरव घाटी में जा गिरा। 

सिर धड़ से अलग होने पर भैरव की आवाज आई है।आदि शक्ति! कल्याणकारिणी माँ! मुझे मरने का कोई दःख। नहीं, क्योंकि मेरी मृत्यु जगत-रचयिता माँ के हाथों हुई है। से हे मातेश्वरी, मुझे क्षमा कर देना। मैं तुम्हारे इस रूप से अपरिचित था। माँ अगर तूने मुझे क्षमा न किया तो आने वाला युग मुझे पापी की दृष्टि से देखेगा और लोग मेरे नाम से घृणा करेंगे। 'माता न हो कुमाता' भैरव के मुख से बारम्बार माँ शब्द सुनकर जग कल्याणी मातेश्वरी ने उसे वरदान दिया कि मेरी पूजा के बाद तेरी भी पूजा होगी तथा तू मोक्ष का अधिकारी होगा। मेंरे श्रद्धालु मेरे दर्शनों के पश्चात् तेरे दर्शन किया करेंगे। तेरे स्थान का दर्शन करने वालों की भी मनोकामना पूर्ण होगी। इसी कथा के अनुसार यात्री दरबार के दर्शनों के बाद वापसी में  भैरो मन्दिर में दर्शन के लिये जाते हैं। जिस स्थान पर भैरव का सिर गिरा था, उसी जगह भैरव मन्दिर का निर्माण हुआ।

सांझी छत से भैरव मन्दिर 1.5 किलोमीटर तथा समुद्रतल 543 फीट की ऊँचाई पर है। भैरव बाबा भक्तों की सब - इच्छाओं को पूर्ण करते हुए यहा विराजमान हैं। आस-पास चाय व फल आदि की दो-तीन दुकानें हैं।

दरबार के दर्शन

उधर भक्त श्रीधर जी को कन्या के अचानक चले जाने से अत्यधिक बेचैनी थी। उन्होंने खाना-पीना भी त्याग दिया था। परन्तु माता तो अपने भक्तों के दिल को जानती हैं अतएव एक रात स्वप्न में वैष्णो मां ने श्रीधर जी को दर्शन दिये और अपने धाम का दर्शन भी कराया। स्वप्र में ही भक्त जी ने माता के -साथ सम्पूर्ण यात्रा की। प्रात:काल श्रीधर जी उठे तो बहुत प्रसन्न थे। स्वप में देखे हए स्थानों से उनका हृदय अब तक पुलकित था।

उसी दिन से पण्डित जी वैष्णो देवी के साक्षात् दरबार की खोज करने लगे। एक दिन स्वप्न में देखे अनुसार चलते-चलते गुफा का द्वार देख लिया और उसमें प्रवेश करके माता के दरबार के साक्षात् दर्शन करके जीवन सफल बना लिया। श्रीधर जी ने हाथ जोड़कर जगदम्बे की आराधना की। माता ने उन्हें  चार पुत्रों का वरदान दिया और कहा कि तुम्हारा वंश मेरी पूजा करता रहेगा, सुख शांति की प्राप्ति होगी, आज तक उनका वंश माँ की पूजा करता आ रहा है।

माता का दरबार 

इसके बाद श्रीधर जी ने गुफा का प्रचार किया। भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती रहीं। प्रचार बढ़ता रहा। हजारों, लाखो यात्री प्रतिवर्ष वैष्णो देवी के दर्शनों के लिये आने लगे।

त्रिकूट पर्वत के आंचल में माता वैष्णो का दरबार भैरव मन्दिर से 2.5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। समुद्र तल से
ऊँचाई 5200  फीट है। दरबार में प्रवेश करने से पूर्व प्रत्येक यात्री को अपना नाम लिखवा कर टोकन लेना पड़ता है. जिय पर यात्री संख्या लिखी रहती है। यह टोकन कटरा से प्राप्त  यात्री-पर्ची देखकर दिया जाता है। पवित्र गुफा में प्रवेश करते समय इसी यात्री-संख्या के अनुसार अनुमति मिलती है।

दरबार में प्रवेश करते ही दायें हाथ पर श्रीधर सभा द्वारा नवनिर्मित विशाल भवन है, जिसमें कई हजार यात्री एक साथा ठहर सकते हैं। थोड़ा आगे चलकर बायीं ओर रावलपिण्डी सभा का कई मंजिला भवन है। इसके अतिरिक्त महाराज रणवीर सिंह द्वारा निर्मित एक विशाल भवन है, जिसमें धर्मार्थ ट्रस्ट का कार्यालय एवं भण्डार भी है। यहाँ लगभग बीस रुपये अमानत रूप में रखकर कम्बल तथा एक दरी मिल जाती है। इसी प्रकार लालटेन एवं खाना बनाने के बर्तन, स्टोव आदि भी यात्रियों को मिल सकते हैं। किसी भी प्रकार से परेशानी नहीं उठानी पड़ती। खाने-पीने के लिए बड़ा भोजनालय, पूजन की सामग्री, चाय एवं हलवा-पूड़ी की दुकानें लगभग चौबीस "घण्टे ही खुली रहती है। इसके अतिरिक्त प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, पोस्ट आफिस, टेलीफोन व्यवस्था एवं पुलिस सहायता भी उपलब्ध है।

गुफा के अन्दर पिण्डी-दर्शन

पवित्र गुफा में प्रवेश करने से पूर्व स्नान करना चाहिये। इसके लिए भवन के नीचे एवं बाजार के अन्त में स्थान बना हुआ है। पुरुषों एवं महिलाओं के स्नान के लिये अलग-अलग प्रबन्ध है। स्नान के लिये पवित्र गुफा में से आने वाली चरण- गंगा की जल धारा गिरती है। इसके पश्चात् टोकन पर मिली संख्या से क्रमानुसार यात्री पंक्तिबद्ध होकर बैठ जाते हैं। पवित्र गुफा के अन्दर चमड़े की वस्तु एवं बीड़ी-सिगरेट आदि ले नाम वर्जित है।

गुफा का प्रवेश द्वारा काफी संकरा (तंग) है। लगभग दो गज तक लेटकर या काफी झुक कर आगे बढ़ना पड़ता है, तत्पश्चात् लगभग 12 गज लंबी गुफा में पत्थर की शिला के नीचे उतरकर, कमर झुकाकर धीरे-धीरे आगे चलना होता है। गुफा  के अंदर सीधे खड़ा नहीं हुआ जा सकता। गुफा के अन्दर जेनरेटर द्वारा प्राप्त विद्युत प्रकाश का प्रबन्ध है, फिर भी यात्री

टार्च ले जावें तो अच्छा रहता है। गुफा के अन्दर टखनो कऊँचाई तक शुद्ध एवं शीतल जल प्रवाहित होता रहता हैं,जिसे चरण गंगा कहते हैं।

गुफा के अन्त में जिस स्थान पर पवित्र पिंडियों के दर्शन  किये जाते हैं, वहाँ एक साथ पांच-छ: व्यक्ति ही बैठ सकते  हैं। सीधे खड़ा होना कठिन है। यहाँ भगवती वैष्णो माँ के  दर्शन तीन-भव्य-पिण्डियों के रूप में होते हैं-महाकाकाली  महालक्ष्मी, एवं महासरस्वती। पिण्डियों के पीछे कछ श्रद्धालु  एवं जम्मू के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यंत्र इत्यादि हैं। पिण्डियों के पास माता की अखण्ड ज्योति  प्रज्जवलित है। प्रातः एवं सायं, दोनों समय पिण्डियों का स्थान श्रृंगार, पूजन एवं आरती होती है।

यात्री लोग भेंट अर्पित करने के पश्चात् प्रसाद लेकर बाहर  जाते हैं। विश्वास किया जाता है कि इसी स्थान पर त्रेतेयुग से  माता वैष्णो तपस्या में लीन हैं और कलयुग में कल्की अवतार  की प्रतीक्षा कर रही हैं। गुफा में सर्वत्र उसी का वास है। वैसे कुछ लोग तीन पिण्डियों में मध्य वाली पिण्डी को ही माता वैष्णो कहते हैं।

बाहर आने पर कन्या-पूजन करके उन्हें पूड़ी, हलवा आदि  देने का रिवाज है। पवित्र दर्शनों का पुण्य लूटकर यात्री लोग  माँ की जय-जयकार करते हये वापिस कटरा के लिए प्रस्थान करते हैं।


सूर्य कुण्ड-

वैष्णो देवी की गुफा के ठीक ऊपर, वैष्णो दरबार से लगभग 6  किलोमीटर की दूरी पर सूर्यकुण्ड नामक एक पवित्र स्थान है। इस स्थान से सूर्योदय का सुन्दर दृश्य दिखलाई देता है 

रसायन गुफा-

वैष्णो माता के चरणों से जो निर्मल जल धारा बहती है, उसी  चरण-गङ्गा के किनारे-किनारे इस गुफा के लिये मार्ग जाता है। इस गुफा में भगवती के दर्शनों के अतिरिक्त भगवान् विष्णु, राम-सीता, राधा-कृष्ण, शालिग्राम आदि अनेक देवी- देवताओं की मूर्तियाँ हैं। यह स्थान वैष्णो दरबार से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। रसायन गुफा से झिड़ी नामक स्थान के लिये भी एक रास्ता जाता है, गुफा में महात्मा लोग सेवा-पूजा कार्य करते हैं।

श्री शंकराचार्य मन्दिर-

त्रिकूट-पर्वत के सामने वाले शिखर पर यह मन्दिर निर्माणाधीन है। इसके दर्शन चढ़ाई चढ़ते समय दूर से स्वतः ही होते हैं। एक पहाड़ी-मार्ग भूमिका मन्दिर से भी चढ़ता है।



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