माता वैष्णो देवी की प्राचीन गुफा
समुद्र तल से पाँच हजार सात सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित यह गुफा वास्तव में माता वैष्णो देवी का मन्दिर है। भू- गर्भ शास्त्रियों की दृष्टि में यह गुफा बहुत ही प्राचीन है, जिसकी लम्बाई लगभग एक सौ फीट, चौड़ाई तीन फीट से छ: फीट, ऊँचाई दो फीट से छः फीट है।
चरण गंगा के उद्गम स्थान पर विद्यमान यह गुफा आज। लाखों यात्रियों की श्रद्धा, भक्ति और आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। जम्मू नगर से पैंतालीस मील की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में शतश्रृंग पर्वत की त्रिकूट नामक चोटियों के मध्यभाग से निकलने वाली चरण गंगा की वर्तमान इस गुफा के सम्बन्ध में विदित होता है-
कि जब माता वैष्णो देवी ने इस गुफा से बाहर महिषासुर का संहार किया तो उसके उपराँत देवता इस स्थान पर प्रकट हुए।
देवी की स्तुति की.........
उपकार के लिए धन्यवाद किया।
भविष्य में भी सहायता करने का घचन लिया।
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| माता वैष्णो देवी |
हरियाली से भरे हुए दूर-दूर तक फैले हुए जंगल, मन को मोहित करने वाली पर्वत श्रेणियाँ, बर्फ से ढके हुए शिखर,गीत गाते हुए झरने, कलरव करते हुए पक्षी, मधुर ध्वनि से प्रवाहित होती हुई चरण-गंगा प्रकृति की इस विभूति को देखकर सम्भवतः माता ने इसी स्थान को अपनी तपोभूमि बनाने का निर्णय किया।
आदि-कमारी स्थान पर जिस प्रकार माता ने तपस्या के निमित्त एक लघु गुफा में निवास किया था, ठीक उसी प्रकार इस स्थान पर भी चरण गंगा के उद्गम स्थान तथा प्रकृति निमित्त गुफा में देवी ने अपना आसन बना लिया। तथा अपने प्रमुख तीनों स्वरूपों के प्रतीकों के रूप में तीन पिण्डियों की स्थापना कर दी।
इसका कारण यह था कि अपने प्रादुर्भावकाल में देवी ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रतीक शुक्ल, रक्त और कृष्ण इन तीनों से सुशोभित थीं।
उस समय ब्रह्मा ने देवी से कहा था- 'हे देवी! तुम्हारा नाम त्रिकला होगा। संसार की तुम सदा रक्षा करोगी। गुणों के अनुसार अन्य भी बहुत से रूप और नाम होंगे। तुममें जो तीन वर्ण दिखाई पड़ते हैं, इनसे तुम अपनी-तीन मूर्तियाँ बना लो।
विया के अंश से महालक्ष्मी और शिव के अंश से महाकाली कहलाई।
इस गुफा में तीन पिंडियाँ इन तीनों देवीरूपों का प्रतीक हैं, और तीन स्वरूपों का समवेत नाम है वैष्णवी।
अर्थात्
जो महालक्ष्मी है, वही महाकाली और महासरस्वती है। एक ही शक्ति के यह तीन अलग-अलग नाम हैं और
सामूहिक रूप से उन्हें वैष्णवी कहा जाता है। जिस प्रकार परब्रह्म परमात्मा एक होने पर भी ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीन रूपों में विभक्त हैं। ठीक उसी प्रकार आदि शक्ति भी प्रयोजनवश तीन रूपों वाली हो गई।
गुफा का मुख्य द्वार और आंगन अब संगमरमर से सुशोभित है। गुफा का प्रवेश द्वार अत्यन्त संकरा है। आगे बढ़ने पर चरण-गंगा के जल की शीतल धारा में चलते हुए धीरे-धीरे अग्रसर होना पड़ता है। गुफा का मार्ग भी अत्यन्त संकरा और कठिन है।यदि बिजली या रोशनी उपलब्ध न हो तो उसमें यात्रियों को घबराहट और बेचैनी महसूस होने लगती है। माता वैष्णो की कृपा से भजन कीर्तन करते जयकारे लगाते हुए यात्रियों की अन्तहीन कतार आगे बढ़ती रहती है। चरण- गंगा की धारा के वाम भाग में एक प्राकृतिक खम्भा है जिसे प्रहलाद का तप्त-स्तम्भ अथवा तत्ता-थम्भ कहते हैं।
इस स्थान से कुछ थोड़ा सा आगे, जहाँ पर नई गुफा का द्वार है, गुफा की छत पर शेषनाग की प्राकृतिक मूति है।शषनाग। की आकृति, उससे अनेक मुख तथा अन्य छोटे-छोटे सापा । की आकृतियाँ आश्चर्य में डालने वाली हैं। इन सबका आदि शक्ति से सम्बन्ध रहा है। वास्तव में माता वैष्णो देवी, माता लक्ष्मी का ही दूसरा नाम है। विष्णु भगवान, माता लक्ष्मी के साथ, शेषनाग पर विराजमान रहते हैं।
सप्तर्षि और प्रहलाद तो विष्णु भक्तों के प्रति अग्रणीय रहे हैं।सप्तर्षियों और प्रहलाद के इस प्रदेश के तीर्थों पर आने के प्रसंग पुराण साहित्य में उपलब्ध होते हैं।
सप्तर्षि इस प्रदेश के तीर्थों की यात्रा पर आये थे। जब वे कुछ वर्षों बाद पुन: यात्रा पर आये तो उनकी बाल्मीकि से भेंट हुई। देवी का यह निवास स्थान अत्यन्त प्रसिद्ध तपो-भूमि थी जहाँ , अनेक ऋषि और महर्षि निवास करते थे। सप्तर्षि भी अनेक बार इस तीर्थ पर रहे थे।
प्रहलाद भगवान विष्णु और परमशक्ति वैष्णवी के परम भक्त थे। भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप में उनकी रक्षा की थी और भगवान नरसिंह के जितने अधिक मन्दिर ऊधमपुर और । रामनगर तहसील में हैं, उतने शायद किसी अन्य प्रदेश में हो। अपनी यात्रा के प्रसंग में प्रहलाद कुरुक्षेत्र से होते हुए रावी तट पर पहुँचे। रावी में स्नान करने के उपरान्त वे देविका नदी पर।
ऊधमपुर से प्रहलाद वैष्णो माता भी गए। अपनी प्रत्येक यात्रा में प्रहलाद सप्तर्षियों की तरह माता के दरबार में आते रहे। गुफा में वर्तमान स्तम्भ इसी बात का प्रतीक है।
आधुनिक काल में भी जिन लोगों का जिन तीर्थों के प्रति विशेष अनुराग होता है, वहाँ पर वे अपने आगमन को स्थायी करने के लिए किसी स्थान पर अपना नाम लिख देते हैं, कमरा, सीढ़ियाँ अन्य निर्माण करवाकर शिलालेख लगवा देते हैं।
इस सम्बन्ध में माता वैष्णो के साथ सबसे अधिक चर्चा पंच-पांडवों की होती है। पांडवों ने माता के भवन को बनाने और संवारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। पांडवों के पिता पांडु, कुन्ती और माद्री नामक अपनी दोनों पत्नियों के साथ अनेक वर्षों तक माता के भवन के साथ रहे थे। यहीं पर रहते समय युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव का जन्म हुआ था। इससे स्पष्ट होता है कि पांडवों का जन्म भी माता वैष्णों के चरणों में हुआ था तथा बचपन के वर्ष उन्होंने इसी गुफा के आस-पास रहकर बिताये थे।
वर्षों बाद अर्जुन को महाभारत का युद्ध लड़ना पड़ा, तो उसमें सफलता प्राप्त करने के लिए उसने माता वैष्णो से प्रार्थना की थी।
विराटनगर में रहते समय मुसीबत आने पर युधिष्ठिर ने भी माँ भगवती से सुरक्षा के लिए अनुरोध किया था। महाभारत ग्रन्थ में भी इसका जिक्र किया गया है।
चरण-गंगा के पावन और शीतल जल से पवित्र हए चरणों से आगे बढ़ते हुए यात्री उस स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ पर नई।गुफा का रास्ता है। इन रास्तों के बन जाने से यात्रियों को बहत आराम हुआ। गुफा में भी ताजी हवा का संचार हो जाने के कारण अब किसी भी यात्री को साँस लेने में कठिनाई नहीं होती। गुफा का यह द्वार ३८ मीटर लम्बा 1.8 मीटर चौड़ा, और 2.2 मीटर ऊंचा है। इसका उद्घाटन डा. कर्णसिंह ने 20 मार्च 1977 को किया था।
इसी स्थान से माता के दरबार में जाने वाली सीढ़ियाँ आरम्भ होती हैं। केवल चौदह सीढ़ियाँ समाप्त होते ही माँ
भगवती का दरबार आ जाता है, जिसकी शोभा एकदम निराली है। प्राकृतिक शिलाखण्ड पर उभरी तीन पिंड़ियाँ हैं। दक्षिण भाग में महासरस्वती की, मध्य में वैष्णवी तथा वामभाग में महाकाली की।
मूल पराशक्ति एक है अत: यह पिंडी भी मूल एक है जो
पाँच छ: फुट लम्बी होऊपर आकर इसी एक पिंडी के सात्विक राजसिक और तामसिक भेद से तीन अलग-अलग रूप हो गए है।
इसी कारण से माता महाकाली की पिंडी काले रंग की माता महालक्ष्मी (वैष्णो) की लाल रंग की तथा माता
महासरस्वती की सफेद रंग की है। मध्यवती पिंडी अन्य दोनों से कुछ बड़ी है।
ये तीन पिंडियाँ राजपत्रों से मंडित हैं तथा सबके सिर पर चाँदी के मकट और सोने के छत्र विराजमान हैं। देवी के तीन रूपों की प्रतीक इन पिंडियों की पृष्ठभूमि में इन्हीं देवियों की साकार मूर्तियाँ स्थापित हैं। माता महाकाली की पिंडी के पास उनकी दो मर्तियाँ हैं एक काले रंग की अष्टधातु की तथा दूसरी संगमरमर की माता वैष्णो की, पिंडी के पीछे महाराजा गुलाबसिंह द्वारा समर्पित ६५ तोले सोने की माता महालक्ष्मी की मूर्ति है, जो कमल के आसन पर आसीन हैं। इसके पीछे गुफा के नए द्वार के उद्घाटन समारोह के अवसर पर डा. कर्णसिंह द्वारा समर्पित २२ तोले सोने से निर्मित सिंह सवार माता वैष्णो की मूर्ति है। इसी प्रकार माता सरस्वती की पिंडी के पीछे भी एक पीतल की तथा एक संगमरमर की मूर्ति है।
माता वैष्णों के बिल्कुल सामने भगवान शिव की सर्प से सुशोभित लघु आकर की पिंडी है तथा दायीं ओर की दीवार में गणेश जी की प्राकृतिक मूर्ति है।
गणेश जी की एक मर्ति गुफा के प्रवेश द्वार के वाम भाग में बनी हुई है तथा गुफा द्वार में प्रवेश करते ही बायीं ओर के शिलाखण्ड पर भगवान जी की प्राकृतिक मूर्ति है। इसके साथ ही माता वैष्णो के वाहन सिंह का पंजा भी गुफा में बना हुआ है, हनुमान जी की मूर्ति के थोड़ा आगे गुफा की दायीं तरफ दीवार में है। जिन्होंने दर्शन किए हैं, केवल वही भाग्यवान प्राणी गुफा के आकार-प्रकार और शोभा को जान सकते हैं।


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