Tuesday, October 8, 2019

वैष्णव माता के अवतार धारण की कथा-

वैष्णव माता के अवतार धारण की कथा-


देश में विपरीत परिस्थितियाँ होने पर, समय-समय पर महाशक्ति ने अपने भिन्न-भिन्न रूप धारण कर, दुष्टा का नाश व भक्तों की रक्षा की है। देवताओं के एकत्रित तेज समूह से उत्पन्न महाशक्ति ने ही कालान्तर में महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती रूप धारण किए-यह तीनों रूप रज, तम एवं सात्विक गुणों के प्रतीक हैं।

त्रेतायुग में जब इस पृथ्वी पर रावण, कुम्भकरण, ताड़का, खर-दूषण आदि दैत्यों ने अत्याचार प्रारम्भ किया तब महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती तीनों महा शक्तियों ने धर्म की रक्षा के लिए अपने तेज समूह से एक दिव्य शक्तिको जन्म देने का निश्चय किया। तीनों शक्ति के स्वरूपों से तेज एकत्रित हुए और संयुक्त होकर एक सुन्दर दिव्य कन्या के रूप में प्रकट हो गए। उस कन्या ने महाशक्तियों से पूछा-आपने मुझे क्यों उत्पन्न किया है। उत्तर मिला कि इस संसार में हमने तुम्हें धर्म की रक्षा एवं प्रचार के लिए प्रकट किया है। अब तुम दक्षिण भारत में रत्नाकर सागर के घर पुत्री बनकर जन्म लो। वहा तुम भगवान विष्णु के अंश से अवतार धारण करो। उसके पश्चात तुम आत्म प्रेरणा से धर्म की रक्षा एवं प्रचार करोगी।

महाशक्तियों की आज्ञानुसार दिव्य कन्या ने रत्नाकर सागर के घर में अवतार धारण किया। कन्या का नाम त्रिकुटा रखा गया। बाद में यही कन्या भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न होने के कारण 'वैष्णवी' नाम से भी विख्यात हुई तथा जिस धर्म का प्रचार कन्या ने किया वह वैष्णव धर्म कहलाया। वैष्णव शब्द का अपभ्रंश ही वैष्णो है।


वैष्णो माता 


अल्प आयु में ही देवी त्रिकुटा ने अपनी अलौकिक शक्ति से ऋषियों मुनियों और देवताओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर लिया। दिव्य कन्या के दर्शनों के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे। कुछ समय बाद त्रिकुटा ने अपने पिता से आज्ञा लेकर समुद्र तटपर, भगवान राम के ध्यान में लीन होकर तप किया तथा उनकी प्रतीक्षा करने लगीं। जब रावण के श्री सीताजी को हरण करने पर, श्रीरामचन्द्र जी वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचे तो उन्होंने वहाँ समाधि में बैठी उस दिव्य कन्या को देखा। श्रीराम उसकी भक्ति देखकर प्रसन्न हुए। भगवान राम के पूछने पर त्रिकुटा ने अपने पिता का परिचय दिया और अपनी घोर तपस्या का कारण भी बताया कि मैंने आपको पति के रूप में प्राप्त करने का संकल्प किया है। यह सुनकर प्रभु बोले-है सुन्दरी! मैंने इस अवतार में एक 
पत्नीव्रती होने का संकल्प किया है। किन्तु त्रिकुटा ने अपने विचार न बदले। अन्त में भगवान् ने कहा कि मैं एक बार तम्हारी कुटिया पर वेष बदल कर आऊँगा, यदि फिर भी तुमने मुझे पहचान लिया तो मैं तुम्हें पत्नी रूप में ग्रहण कर लूंगा। लंका से अयोध्या लौटते समय भगवान् वृद्ध साधु का रूप धरकर वहाँ गए। कन्या उन्हें पहचान न सकी। भगवान राम ने आश्वासन दिया कि कलयुग में कल्की अवतार के समय तुम  मेरी सहचरी बनोगी। उस समय तक तुम उत्तर भारत में मणिक पर्वत पर, तीन शिखरों वाले त्रिकूटपर्वत की उस सुरम्य गुफा में, जहाँ तीन महाशक्तियों का निवास है, वहाँ पहुंचकर तपस्या में लीन हो जाओ। वहां पर तुम अमर हो जाओगी। नल, नील, हनुमान, जामवन्त आदि लांगुर वीर तुम्हारे प्रहरी होंगे। समस्त भारत में तुम्हारी महिमा फैलेगी और वैष्णोदेवी नाम से तुम्हारी प्रसिद्धि होगी।

विश्वास किया जाता है कि तभी से रत्नाकर सागर की कुंवारी कन्या वैष्णवी, जो देवताओं के पुण्य आशीर्वाद से
प्राप्त हुई, रामावतार के समय त्रेता युग से ही इस सुन्दर गुफा में विराजमान है और तपस्या में लीन है। जिसके विषय में प्राचीन कथाओं से आधार लिया जा सकता है... युग बदलते गये, माता अपनी लीलाएँ समय-समय पर दिखलाती आई और कितनी ही अन्य कथाओं का जन्म हुआ। माता ने अपनी लीला इन स्थानों पर विशेष रूप से की जिस कारण इसे महत्वपूर्ण माना गया। कलयुग में इसी कथा का प्रचार अधिक हुआ है।


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