देवी माँ की उत्पत्ति कैसे हुई ?
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| माता वैष्णो देवी |
पौराणिक कथानुसार एक समय सुरथ नाम के राजा ने कुटुम्ब से उदासीन होकर, राज-पाट त्याग कर, मुनियों जैसा वेष धारण कर लिया और घोर वन की ओर चले गये। वहाँ उनकी भेंट समाधि नामक एक वैश्य से हुई जो ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से घर छोड़कर आया था। दोनों मिलकर सुमेधा ऋषि के आश्रम पर पहुँचे। सुमेधा ऋषि ने उन्हें आदि शक्ति महामाय की निम्न कथा सुनाई...................
एक बार जब भगवान विष्णु अपार सागर में अपनी नाग शैया पर शयन कर रहे थे तो उनकी नाभि कमल से पैदा हुए ब्रह्मा ने कानों की मैल से अति दीर्घ देह वाल मधु कटभ नाम के दो दैत्यों की रचना की। उन राक्षसों को देखकर लोकेश भयभीत हो गये और हृदय में असुरों के नाश के लिए जगत्माता (शक्ति) का ध्यान करने लगे।
बहुत समय बाद पुनः एक राक्षस महिषासुर उत्पन्न हुआ। जिसने अपनी भुजाओं के बल पर समस्त संसार को जीत लिया। देवताओं और राक्षसों में एक सौ वर्ष तक घोर संग्राम हुआ। परिणाम यह हुआ कि देवताओं को राक्षसों से पराजित होना पड़ा और उनका समस्त राजपाट दैत्यों ने संभाल लिया। अपने अधिकार खो जाने पर देवता एकत्र होकर ब्रह्मा जी के पास गये और महिषासुर के अन्याय की सब कथा कह सुनाई।
देवताओं की बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि मैं तो महिषासुर को वरदान दे चुका हूं कि उसकी मृत्यु किसी कुंवारी कन्या के हाथों से होगी। हम उसे पराजित नहीं कर सकते।
ब्रह्मा जी के मुख से यह शब्द सुनकर देवताओं में नीरवता छा गई। वह बोले-'नहीं प्रभु, हमें हमारे अधिकार चाहिये। हमारी सहायता का कोई अन्य उपाय निकालिए।
महिषासुर के विनाश के लिए अन्य उपाय की खोज में समस्त देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान शंकर और भगवान विष्णु के पास गये। देवताओं की दुःखी आत्माओं ने राक्षसों के अत्याचार का वर्णन उन्हें भी सुनाया... हे प्रभु उन महापराक्रमी दैत्यों ने हमें अपने अधिकारों से वंचित कर दिया, घर-बार सब उजाड़ दिए, हे लोकेश! अग्रि, सूर्य, इन्द्र, चन्द्र, वरुण हम सब देवताओं का सुख-चैन छीन कर दैत्यों ने हमें जबरदस्ती बाहर धकेल दिया है। हम आपकी शरण में हैं, रक्षा करो।
भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक के केश, विष्णु के तेज से भुजायें, चन्द्रमा के तेज से स्तन, इन्द्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पैरों की उँगलियाँ, वासुओं के तेज से दोनों हाथ की उँगलियाँ, प्रजापति के तेज से सारे दाँत, अग्नि के तेज से कान और अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने।
इसके पश्चात् भगवान शिव ने उस देवी को अपना त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, वरुण ने दिव्य शंख और पाश, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, इन्द्र ने वज्र, यमराज ने दण्ड, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, ब्रह्मा जी ने कमण्डल, काल ने ढाल तलवार; इसी प्रकार भगवान राम ने धनुष, हनुमान ने गदा आदि अस्त्र-शस्त्र उस देवी को भेंट किए। सूर्य ने उसके रोमकूपों में अपनी किरणों को भर दिया। समुद्र ने बहुत उज्जवल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुण्डल, हाथों के कंगन, दोनों भुजाओं के लिए मयूर, पैरों के नूपुर, गले के लिए सुन्दर हंसली और सब उंगलियों में पहनने के लिए अंगूठियाँ भेंट की। विश्वकर्मा ने निर्मल फरसा लक्ष्मीजी ने कभी न मुरझाने वाले कमल के फूल और हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह प्रदान किया।
मधु-कैटभ वध-
इधर मधु-कैटभ ने अपने बाहुबल से अन्य देवताओं को सताना और उनके अधिकार छीनने आरंभ कर दिए। कई देवताओं ने मिलकर उनसे युद्ध किया लेकिन पाँच हजार वर्ष तक लड़कर भी देवता महाबली दैत्यों को न मार सके। हारकर देवताओं ने शक्ति की आराधना की तो शक्ति ने चण्डी रूप में प्रकट होकर असुरों का संहार किया। राक्षसों के वध से देवताओं को पुनः राज्य प्राप्त हुआ और समाज सुखी हुआ।![]() |
| माता वैष्णो देवी |
देवताओं की बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि मैं तो महिषासुर को वरदान दे चुका हूं कि उसकी मृत्यु किसी कुंवारी कन्या के हाथों से होगी। हम उसे पराजित नहीं कर सकते।
ब्रह्मा जी के मुख से यह शब्द सुनकर देवताओं में नीरवता छा गई। वह बोले-'नहीं प्रभु, हमें हमारे अधिकार चाहिये। हमारी सहायता का कोई अन्य उपाय निकालिए।
महिषासुर के विनाश के लिए अन्य उपाय की खोज में समस्त देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान शंकर और भगवान विष्णु के पास गये। देवताओं की दुःखी आत्माओं ने राक्षसों के अत्याचार का वर्णन उन्हें भी सुनाया... हे प्रभु उन महापराक्रमी दैत्यों ने हमें अपने अधिकारों से वंचित कर दिया, घर-बार सब उजाड़ दिए, हे लोकेश! अग्रि, सूर्य, इन्द्र, चन्द्र, वरुण हम सब देवताओं का सुख-चैन छीन कर दैत्यों ने हमें जबरदस्ती बाहर धकेल दिया है। हम आपकी शरण में हैं, रक्षा करो।
देवताओं के तेज से देवी का प्रकट होना-
देवताओं की यह दःखमय कथा सुनकर भगवान विष्णु और शंकर जी के मस्तक से बिजली कड़कने लगी! क्रोध के कारण मुख से एक महान शक्तिशाली तेज प्रकट हुआ। ब्रह्माजी के क्रोधित शरीर से भी इसी प्रकार का तेज निकला। जब समस्त देवताओं के तेज एक ही स्थान पर प्रकट हुए तो वह महान तेज संसार के हर कोने को रोशन करने लगा। जब यह तेज एकत्र हुए तो उसने एक अति सुन्दर नारी 'देवी' का रूप धारण कर लिया। जो देव नगरी में सबसे महान और शक्तिशाली प्रतीत होता था। देवताओं की देह से निकले हुए इस तेज से ही शक्ति के विभिन्न अंग बने-![]() |
| माता वैष्णो देवी |
भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक के केश, विष्णु के तेज से भुजायें, चन्द्रमा के तेज से स्तन, इन्द्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पैरों की उँगलियाँ, वासुओं के तेज से दोनों हाथ की उँगलियाँ, प्रजापति के तेज से सारे दाँत, अग्नि के तेज से कान और अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने।
इसके पश्चात् भगवान शिव ने उस देवी को अपना त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, वरुण ने दिव्य शंख और पाश, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, इन्द्र ने वज्र, यमराज ने दण्ड, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, ब्रह्मा जी ने कमण्डल, काल ने ढाल तलवार; इसी प्रकार भगवान राम ने धनुष, हनुमान ने गदा आदि अस्त्र-शस्त्र उस देवी को भेंट किए। सूर्य ने उसके रोमकूपों में अपनी किरणों को भर दिया। समुद्र ने बहुत उज्जवल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुण्डल, हाथों के कंगन, दोनों भुजाओं के लिए मयूर, पैरों के नूपुर, गले के लिए सुन्दर हंसली और सब उंगलियों में पहनने के लिए अंगूठियाँ भेंट की। विश्वकर्मा ने निर्मल फरसा लक्ष्मीजी ने कभी न मुरझाने वाले कमल के फूल और हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह प्रदान किया।
इस प्रकार सब देवताओं ने देवी को अनेक प्रकार के आयुधों से सुसजित करके सम्मानित किया और महिषासुर के वध के लिए देवी से प्रार्थना की।
महिषासुर वध-
महाशक्ति ने जब क्रोध में आकर गर्जना की तो भू-मण्डल काँपने लगा। आकाश पर बिजली कड़कती प्रतीत होने लगी। यह देखकर सभी देवताओं ने संगठित स्वर से शक्ति की जय बोली। इस समय महिषासुर अपनी भक्ति में लीन था उसने भी देखा कि पृथ्वी से आकाश तक उथल-पुथल मची है। किसी अज्ञात शक्ति की जय-जयकार हो रही है। क्रोध में आकर उसने उस शक्ति का नाश करने की ठान ली और वह महाबली अपने सारे दैत्यों को लेकर शक्ति को मारने के लिए दौड़ा। महिषासुर के देवी की ओर देखते ही आँखें चुंधिया गईं, दुर्गा अपने विराट और क्रोधित रूप में खड़ी थीं।
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| महिषासुर |
देवी का युद्ध दैत्यों से हुआ।
सर्वप्रथम महिषासुर का सेनानायक देवी से लड़ने आया। लाखों राक्षस अनेक अस्त्रों-शस्त्रों से अकेली देवी पर लगातार, प्रहार करते रहे और जगदम्बा मातेश्वरी दुष्ट आत्माओं का खात्मा करती रही। माँ दुर्गा ने कई बड़े-बड़े राक्षसों को अपनी गदा और त्रिशूल से मौत की नींद सुला दिया। अनगिनत राक्षस मारे गये और हजारों अपनी बाहें खो बैठे। कइयों का सिर धड़ से अलग हो गया। जो मूर्ख थे वह मैदान छोड़कर भाग गये। कई दैत्य मौत के डर से देवी के पाँवों पर गिरकर क्षमा माँगते रहे।
दैत्यों के इस घोर विनाश को देखकर महिषासुर का सेनापति चिक्षुर क्रोधित स्वर से चिल्लाया-'ऐ कन्या, तूने मेरी सेना को तो मौत के घाट उतार दिया लेकिन तुझे मेरी शक्ति का अनुमान नहीं अब तू मेरे लोहे जैसे बलशाली हाथों से बचकर नहीं जा सकती। मैं तेरा सर्वनाश कर दूंगा।' और फिर पल भर में ही सेनापति अपने बचे हुए साथियों के साथ तीरों की ऐसी बौछार करने लगा कि जैसे आंधी चलने से रेत उड़ती है। रणभूमि की यह दशा और राक्षसों के इतने तेज प्रहार को देखकर देवी ने भी क्रोध में तीरकमान निकाला और एक तीर दैत्य की ओर
छोड़ा। उस एक तीर से ही इतने तीर निकलने लगे कि जैसे भयानक रात में लाखों जुगनू भटक रहे हों। इन तीरों ने राक्षसों के सीने छलनी कर दिए। लड़ते-लड़ते सेनापति चिक्षुर के सारे हथियार समाप्त हो गए तो वह ढाल और तलवार लेकर ही मातेश्वरी की तरफ दौड़ा।
उसने तलवार से देवी पर प्रहार किया लेकिन जब तलवार देवी के शरीर से टकराई तो टुकड़े-टुकड़े होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। फिर चिक्षुर ने त्रिशूल से देवी दुर्गा पर वार किया। चमकते हुए त्रिशूल को अपनी ओर आता देखकर जगदम्बा ने भी उस पर त्रिशूल फेंका। देवी का त्रिशूल
चिक्षर के त्रिशूल से टकराकर उसे भी चिक्षुर की ओर ले चला और फिर उस त्रिशूल ने सेनापति का सीना चीर डाला।
अपनी सेना का खून पानी की तरह बहता देखकर महिषासुर ने एक विकराल भैंसे का रूप धारण करके देवी को मारने की असफल कोशिश की। यह देखकर जगदम्बा को बड़ा क्रोध आया और उसने किसी प्रकार दैत्यराज महिषासुर को बाँध लिया। लेकिन उसी समय महिषासुर ने भैंसे का रूप त्यागकर सिंह का रूप धारण कर लिया। जब शक्ति ने उसे भी अपने वाणों से वश में कर लिया तब उसने अपने आपको एक बड़े गजराज में बदल लिया और अपनी सूंड से देवी को अपनी ओर-खींचने लगा। देवी ने भी तीव्र प्रहार किया और गजराज की
सूंड काट डाली। तब पुनः महिषासुर महादैत्य ने अपने को भैंसे के शरीर में परिवर्तित कर दिया।
महिषासुर गर्जने लगा!
उसके स्वर से त्रिलोकी व्याकुल हो उठी!!
इस समय माता भी अपनी शक्तियों से महिषासुर के चलाये - शस्त्रों को चकनाचूर करने लगी। तीव्र क्रोध में आकर शक्ति ने भी गर्जना कर कहा-'तूने अभिमान में आकर, देवताओं से उनके अधिकार छीनकर, उनकी पवित्र आत्माओं को बड़ा कष्ट दिया है। मूर्ख! मैं तेरा सर्वनाश करके ही चैन लूंगी।' इतना कहते ही देवी ने उछल कर महिषासुर को पकड़ लिया। अपने पाँव तले दबाकर उसके कण्ठ पर त्रिशूल का प्रहार किया तो महिषासुर अपने असली रूप में भैंसे के शरीर से बाहर आने लगा। अभी वह आधा ही बाहर निकल पाया था कि देवी ने अपनी शक्ति से उसे वहीं रोक दिया और तलवार से उसका सिर काट डाला।
अपने महाराज दैत्य महिषासुर की इतनी बुरी दशा देखकर शेष सभी दैत्य मैदान छोड़कर भाग गये। महिषासुर को मरा देखकर सब देवी देवताओं में खुशी की लहर दौड़ आई। सब मिलकर दुर्गा जी की आरती उतारने लगे। विजय प्राप्ति के बाद समस्त देवताओं ने देवी के आगे नतमस्तक होकर बारम्बार यही विनय की-"आपने महान बलशाली राक्षस को मारकर हमें प्रसन्न किया, हमारे अधिकार हमें प्राप्त हुए। हमारी सब। इच्छायें पूर्ण हो गई हैं। अब हम आपसे यही विनय करेंगे कि जब भी हम आपका स्मरण करें, आप दर्शन दिया करें और हमारे संकटों का निवारण करें। हम आपके भक्त हैं हमारी मसीबत के समय में आप हमारे शत्रओं का नाश करके सबको
प्रसन्न किया करें।"
शुम्भ और निशुम्भ का अत्याचार-
महिषासुर के बाद शुम्भ और निःशुम्भ दो और असुर हुए जिन्होंने इन्द्र, सूर्य, अग्नि आदि देवताओं को अधिकार हीन करके, राज्य छीनकर इन्द्रपुरी पर आसन जमा लिया। एक बार फिर देवताओं को राक्षसों से अपमानित होना पड़ा। तब देवताओं ने मातेश्वरी को याद किया और विचारा कि माता ने हमको वरदान दिया था कि जब भी मेरे भक्तों पर आपत्ति आवेगी मैं उनकी रक्षा करूंगी। महिषासुर की तरह नये उठने वाले राक्षसों का वध कर दूंगी।
श्री दुर्गा जी के इस आश्वासन का ध्यान कर देवता माता के आमन्त्रण के लिए हिमालय पर जाकर उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार जब सारे देवता मिलकर शक्ति का आह्वान कर रहे थे तो देवी पार्वती उधर से आ निकलीं। उस अति सुन्दर पार्वती ने देवताओं से पूछा-'आप किस का आह्वान कर रहे हैं, किसकी स्तुति में मग्न हैं?' 'हे भगवती, शुम्भ-निशुम्भ ने हमारा अपमान किया है उन्हीं के अत्याचारों से पीड़ित होकर हम यहाँ सहायता के लिए श्री दुर्गा जी को याद कर रहे हैं। देवताओं का यह उत्तर सुनकर पार्वती जी वहां से लोप हो गई।
एक दिन शुम्भ और निशुम्भ के दो शक्तिशाली दूत जिनका नाम चण्ड और मुण्ड था घूमते हुए हिमालय पर आ निकले। वहाँ उन्होंने अति सुन्दर रूप में माँ अम्बे को भक्ति में लीन देखा। उन्होंने ऐसी मनोहर रूप की नारी को पहले कभी न देखा था, रूप ऐसा सुन्दर कि पूरा हिमालय आलोकित हो रहा था। चण्ड और मुण्ड ने इस अनुपम सुन्दरी का वर्णन तुरन्त जाकर अपने स्वामी शुम्भ और निशुम्भ से इस प्रकार किया। उसका दुःख दूर करने वाला चन्द्र जैसा मुख है। पलकें सर्प की शोभा को चुराती हैं। नेत्र कमल से बढ़कर हैं, धनुष जैसी भवें हैं, बाण जैसी पलकें हैं। सिंह जैसा कटिभाग है, हस्ति जैसी गति, रति की शोभा को भी हरने वाली है। हाथ में खड्ग है जो सूर्य के समान प्रकाशवान है, मनोहर रूप धारण किए। शिव की अर्धांगिनी प्रतीत होती है।
"सुन्दरी की ऐसी प्रशंसा सुनकर शुम्भ ने दूतों को देवी के -पास विवाह का प्रस्ताव लेकर भेजा। दूतों ने जाकर जब देवी से शम्भ की बात कही तो देवी ने उत्तर दिया-रे मतिहीन, जाकर दैत्य से कह दे कि जो मुझको युद्ध में जीतेगा मैं उसी को वर मानूंगी।
धूम्रनयन वध-
शुम्भ और निशुम्भ की सभा में दूत ने जाकर जब देवी की यह बात कही तो सभा के मध्य से धूम्रनयन नामक राक्षस ने उठकर बड़े गर्व से कहा-मैं उसको बातों में ही रिझाकर ला सकता हूं अगर वह न मानेगी तो केश पकड़ कर घसीट लाऊंगा।
धूम्रनयन की यह बात सुनकर शुम्भ ने उसे देवी को लाने के लिये एक बड़ी सेना देकर भेज दिया। इसी सेना में शुम्भ के दो बड़े विश्वस्त दैत्य चण्ड और मुण्ड भी थे।
उधर चण्ड-मण्ड के साथ एक बड़ी राक्षसी सेना को
आता देखकर देवी को बड़ा जबरदस्त क्रोध आ गया और इस क्रोध के कारण जगदम्बा का मुख काला पड़ गया और तुरन्त ही वहाँ विकराल रूप में काली देवी प्रकट हुई। बड़े-बड़े राक्षसों को मारती हुई महाकाली ने अपनी कृपाण से धूम्रनयन का सिर एक झटके में अलग कर दिया और महाबली धूम्रनयन सदा के लिए रणभूमि में सो गया।
चंड-मुंड वध-
जब सेनापति धूम्रनयन मारा गया तो मुण्ड को क्रोध आ गया वह आगे बढ़-बढ़ कर काली पर हमला करने लगा। मुण्ड से भयानक युद्ध के बाद देवी ने मुण्ड का सिर इस प्रकार अलग कर दिया जैसे बेल से कहू गिर जाता है।
अब देवी ने बरछा लेकर ऐसा मारा कि चण्ड का सिर धड़ से अलग होते एक क्षण की देर भी न लगी।
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चंड-मुंड वध |
रक्तबीज वध-
अपने महान् दैत्यों के मारे जाने पर शुम्भ निशुम्भ ने एक विशिष्ट राक्षस रक्तबीज को लड़ने के लिए भेजा। रक्तबीज को यह वरदान था कि उसके शरीर से जितनी रक्त की बूंदे गिरेंगी उतने ही रक्तबीज और पैदा हो जायेंगे। रक्तबीज को वास्तव में इसका अभिमान होना भी ठीक ही था। वह किसी भी रणभूमि में सहर्ष जाया करता और आज वह उसी हर्ष से देवी से लड़ने निकल पड़ा। देवी को समक्ष देख उसने घोर अट्टहास किया और तीरों की ऐसी वर्षा की कि देखने वालों को भ्रम होने लगा कि वास्तव में वर्षा है या तीरों की बौछार। एक दूसरे पर प्रहार का यह क्रम लगातार बहुत समय तक चलता रहा। अब तक दर्गा ने रक्तबीज पर जितने प्रहार किये उनसे रक्तबीज के शरीर से जगह-जगह खून बह रहा था। उस खन की जितनी बदें भमि पर गिरती उतने रक्तबीज और पैदा होते जाते थे। इ प्रकार उत्पन्न अगणित रक्तबीजों ने दुर्गा और उसके सिंह को घेर लिया लेकिन चण्डी और सिंह ने मिलकर युद्ध में उन सब दैत्यों का समूह मार गिराया।
इस प्रकार जब रक्तबीज के रक्त से बार-बार अनेकों रक्तबीज उत्पन्न होते रहे तो चण्डी ने काली से कहा कि मैं इस महाबलशाली दैत्य पर प्रहार करूँ तो तुम इसके खून को जमीन पर न गिरने दो। तब काली ने अपने रौद्र रूप में हाथ में खप्पर लेकर रक्तबीज से गिरने वाली खून की बूंदों को खप्पर में भर-भर पिया। माता ने रक्तबीज को जब अन्तिम बार त्रिशूल से मारा तो काली माँ ने उसका सारा खून पी लिया। इस प्रकार शक्ति ने उसका सर्वनाश किया।
निशुम्भ वध-
जो मामूली राक्षस बच गये उन्होंने जाकर अपने स्वामी शुम्भ और निशुम्भ से श्रोणित बिन्दु के मारे जाने की खबर दी यह सुनकर निशुम्भ हाथ में खड्ग संभालते हुए बोला-क्या रक्तबीज भी चण्डी से ऐसा मारा गया जैसे जंगल का शेर छोटे जानवरों को मार डालता है।
कोप में भरकर शुम्भ-निशुम्भ ने युद्ध की ऐसी दुन्दुभी बजायी कि दसों दिशायें गूंज उठीं। रणनीति के अनुसार अपनी सेनाओं को अनेक प्रकार से सजाकर ध्वजा फहराता हुआ निशम्भ ऐसे चला मानो कोई पहाड़ ही उठकर चल दिया हो। हर ओर धूल ही धूल उड़ने लगी। उधर चण्डी के कानों में भी एक नये दैत्य के आगमन की भनक पड़ी। चण्डी ने भी पहाड़ से उतरकर शत्रु को ललकारते हुए महान कोलाहल किया। देवी को देखते ही निशुम्भ ने एक बहुत बड़ा धनुष तान लिया उसकी टंकार ही ऐसी बजी कि मानो बादल गरज रहे हों। ऐसे
भयंकर दैत्य को देखकर देवी ने अपनी सभी शक्तियों को अपने में समा लिया। देवी और निशुम्भ का घोर संग्राम हुआ। शत्रुओ के सिर ऐसे गिर रहे थे जैसे शहतूत के वृक्ष को हिलाने से शहतूत गिरते हैं। पूर्ण क्रोध में भरकर जब चण्डी ने निशुम्भ पर तीर मारा तो उसका सिर भी दो टुकड़े होकर गिरा और रणभूमि में अंधेरा छा गया।
शुम्भ वध-
निशम्भ का सिर जब इस प्रकार मैदान में गिर गया तो एक दैत्य अपना धनुषवाण छोड़कर दौड़कर शुम्भ के पास गया और उसे उसके भाई के मारे जाने की सूचना दी।
अपने प्यारे भाई के मारे जाने पर शुम्भ के क्रोध का ठिकाना न रहा। वह बिना एक पल भी व्यतीत किये बिना
मातेश्वरी से बदला लेने के लिए दौड़ा। अभिमान में भर मातेश्वरी से बोला-तूने काली समेत अन्य शक्तियों की सहायता लेकर मेरी इतनी बड़ी सेना और मेरे भाई को मारा है, अब देख मैं
तुझसे अकेले ही बदला लूंगा।
मातेश्वरी ने कहा-'मेरे साथ अन्य कोई दूसरी शक्ति नहीं है। समय आने पर मेरी शक्ति अलग-अलग रूप धारण कर मेरे ही शरीर से निकलती है और फिर मुझमें ही प्रवेश कर जाती है। यह देख अब मैं तुझसे लड़ने के लिए अकेली ही खड़ी हूँ। तैयार हो जा!' युद्ध में शुम्भ के भी प्राण निकल गए और सब देवताओं ने मिलकर फिर माता का जैकारा बोला।
समाप्त !!!...
जय मां वैष्णो देवी
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